ईशा फाउंडेशन द्वारा विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित ‘मिट्टी बचाओ’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ

नमस्‍कार!

आप सभी को, पूरे विश्व को विश्व पर्यावरण दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। सदगुरू और ईशा फाउंडेशन भी आज बधाई के पात्र हैं। मार्च में उनकी संस्था ने Save Soil अभियान की शुरुआत की थी। 27 देशों से होते हुए उनकी यात्रा आज 75वें दिन यहां पहुंची है। आज जब देश अपनी आजादी के 75वें वर्ष का पर्व मना रहा है, इस अमृतकाल में नए संकल्प ले रहा है, तो इस तरह के जन अभियान बहुत अहम हो जाते हैं।

साथियों,

मुझे संतोष है कि देश में पिछले 8 साल से जो योजनाएं चल रही हैं, जो भी प्रोग्राम चल रहे हैं, सभी में किसी ना किसी रूप से पर्यावरण संरक्षण का आग्रह है। स्वच्छ भारत मिशन हो या Waste to Wealth से जुड़े कार्यक्रम, अमृत मिशन के तहत शहरों में आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का निर्माण हो या फिर सिंगल यूज़ प्लास्टिक से मुक्ति का अभियान, या नमामि गंगे के तहत गंगा स्‍वच्‍छता का अभियान, One Sun-One ग्रिड – सोलर एनर्जी पर फोकस हो या इथेनॉल के उत्पादन और ब्लेंडिंग दोनों में वृद्धि, पर्यावरण रक्षा के भारत के प्रयास बहुआयामी रहे हैं और भारत ये प्रयास तब कर रहा है जब दुनिया में आज जो क्‍लाइमेट के लिए दुनिया परेशान है, उस बरबादी में हम लोगों की भूमिका नहीं है, हिंदुस्‍तान  की भूमिका नहीं है।

विश्व के बड़े और आधुनिक देश ना केवल धरती के ज्यादा से ज्यादा संसाधनों का दोहन कर रहे हैं, बल्कि सबसे ज्यादा कार्बन एमिशन भी उन्हीं के खाते में जाता है। कार्बन एमिशन का ग्लोबल औसत प्रति व्यक्ति 4 टन का है। जबकि भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट प्रतिवर्ष आधे टन के आसपास ही है। कहां चार टन और कहां आधे टन। बावजूद इसके, भारत पर्यावरण की दिशा में एक होलिस्टिक अप्रोच के साथ न केवल देश के भीतर, बल्कि वैश्विक समुदाय के साथ भी जुड़ करके काम कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत ने Coalition for Disaster Resilient Infrastructure (CDRI) और जैसे अभी सद्गुरू जी ने कहा है, International Solar Alliance, ISA के निर्माण का नेतृत्व किया है। पिछले वर्ष भारत ने ये भी संकल्प लिया है कि भारत वर्ष 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करेगा।

साथियों,

मिट्टी या ये भूमि, हमारे लिए पंचतत्वों में से एक है। हम माटी को गर्व के साथ अपने माथे से लगाते हैं। इसी में गिरते हुए, खेलते हुए हम बड़े होते हैं। माटी के सम्मान में कोई कमी नहीं है, माटी की अहमियत को समझने में कोई कमी नहीं है। कमी इस बात को स्वीकारने में है कि मानव जाति जो कर रही है उससे मिट्टी को कितना नुकसान हो रहा है, उसकी समझ का एक गैप रह गया है। और अभी सद्गुरू जी कह रहे थे कि सबको पता है समस्‍या क्‍या है।

हम जब छोटे थे तो सिलेबस में, किताब में पाठयक्रम में हमें एक पाठ पढ़ाया जाता था, गुजराती में मैंने पढ़ा है, बाकियों ने अपनी भाषा में पढ़ा हो शायद…कहीं रास्‍ते पर एक पत्‍थर पड़ा था, लोग जा रहे थे। कोई गुस्‍सा कर रहा था, कोई उस पर लात मार देता था। सब कहते थे कि ये किस ने पत्‍थर रखा, कहां से पत्‍थर आया, ये समझते नहीं, वगैरह-वगैरह। लेकिन कोई उसको उठा करके साइड में नहीं रखता था। एक सज्‍जन निकले, उनको लगा कि चलो भई…सद्गुरू जैसा कोई आ गया होगा।

हमारे यहां युधिष्ठिर और दुर्योधन की भेंट की जब चर्चा होती है तो दुर्योधन के विषय में जब कहा जाता है तो यही कहा जाता है कि – ”जानाम धर्मं न च में प्रवृत्ति।।”

मैं धर्म को जानता हूं, लेकिन मेरी प्रवृत्ति नहीं है, मैं नहीं कर सकता, वो सत्‍य है क्‍या है मुझे मालूम है, लेकिन मैं उस रास्‍ते पर नहीं चल सकता। तो समाज में जब ऐसी प्रवृत्ति बढ़ जाती है तो ऐसा संकट आता है तो सामूहिक अभियान से समस्‍याओं के समाधान के लिए रास्‍ते खोजने होते हैं।

मुझे खुशी है कि बीते आठ वर्षों में देश ने मिट्टी को जीवंत बनाए रखने के लिए निरंतर काम किया है। मिट्टी को बचाने के लिए हमने पांच प्रमुख बातों पर फोकस किया है-

पहला- मिट्टी को केमिकल फ्री कैसे बनाएं। दूसरा- मिट्टी में जो जीव रहते हैं, जिन्हें तकनीकी भाषा में आप लोग Soil Organic Matter कहते हैं, उन्हें कैसे बचाएं। और तीसरा- मिट्टी की नमी को कैसे बनाए रखें, उस तक जल की उपलब्धता कैसे बढ़ाएं। चौथा- भूजल कम होने की वजह से मिट्टी को जो नुकसान हो रहा है, उसे कैसे दूर करें और पांचवा, वनों का दायरा कम होने से मिट्टी का जो लगातार क्षरण हो रहा है, उसे कैसे रोकें।

साथियों,

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ही देश में बीते वर्षों में जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ है, वो है देश की कृषि नीति में। पहले हमारे देश के किसान के पास इस जानकारी का अभाव था कि उसकी मिट्टी किस प्रकार की है, उसकी मिट्टी में कौन सी कमी है, कितनी कमी है। इस समस्या को दूर करने के लिए देश में किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड देने का बहुत बड़ा अभियान चलाया गया। अगर हम किसी को मनुष्‍य को हेल्‍थ कार्ड दें ना तो भी अखबार में हेडलाइन बन जाएगी कि मोदी सरकार ने कुछ अच्‍छा काम किया है। ये देश ऐसा है जो सॉयल हेल्‍थ कार्ड दे रहा है लेकिन मीडिया की नजर अभी कम है।

पूरे देश में 22 करोड़ से ज्यादा सॉयल हेल्थ कार्ड किसानों को दिए गए। और सिर्फ कार्ड ही नहीं दिए, बल्कि देशभर में सॉयल टेस्टिंग से जुड़ा एक बहुत बड़ा नेटवर्क भी तैयार हुआ है। आज देश के करोड़ों किसान Soil Health Card से मिली जानकारी के आधार पर fertilizers और माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स का उपयोग कर रहे हैं। इससे किसानों को लागत में 8 से 10 प्रतिशत की बचत तो हुई है और उपज में भी 5-6 प्रतिशत की बढोतरी देखी गई है। यानि जब मिट्टी स्वस्थ हो रही है, तो उत्पादन भी बढ़ रहा है।

मिट्टी को लाभ पहुंचाने में यूरिया की शत प्रतिशत नीम कोटिंग ने भी बहुत फायदा पहुंचाया है। माइक्रो-इरीगेशन को बढ़ावा देने की वजह से, अटल भू योजना की वजह से देश के अनेक राज्यों में मिट्टी की सेहत भी संभल रही है। कभी-कभी कुछ चीजें आप मान लीजिए कोई डेढ़-दो साल का बच्‍चा बीमार है, तबियत ठीक नहीं हो रही है, वेट नहीं बढ़ रहा है, ऊंचाई में भी कोई फर्क नहीं आता है और मां को कोई कहे कि जरा इसकी चिंता करो और उसको कहीं सुना हो कि भई स्‍वास्‍थ्‍य के लिए दूध वगैरह चीजें अच्‍छी होती हैं और मान लो वो हर दिन 10-10 लीटर दूध में उसको स्‍नान करवा दे तो उसका स्‍वास्‍थ्‍य ठीक होगा क्‍या? लेकिन अगर कोई समझदार मां एक-एक चम्‍मच, थोड़ा-थोड़ा सा दूध उसको पिलाती जाए, दिन में दो बार, पांच बार, सात बार, एक-एक चम्‍मच, तो धीरे-धीरे फर्क नजर आएगा।

ये फसल का भी ऐसा ही है। पूरा पानी भर करके फसल को डुबो देने से फसल अच्‍छी होती है ऐसा नहीं है। बूंद-बूंद पानी पिलाया जाये तो फसल ज्‍यादा अच्‍छी होती है, Per Drop More Crop. अनपढ़ मां भी अपने बच्‍चे को दस लीटर दूध से नहलाती नहीं है, लेकिन पढ़े-लिखे हम लोग पूरा खेत पानी से भर देते हैं। खैर, इन सारी चीजों में बदलाव लाने के लिए कोशिश करते रहना है।

हम Catch the Rain जैसे अभियानों के माध्यम से जल संरक्षण से देश के जन-जन को जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। इस साल मार्च में ही देश में 13 बड़ी नदियों के संरक्षण का अभियान भी शुरू हुआ है। इसमें पानी के प्रदूषण को कम करने के साथ-साथ नदियों के किनारे वन लगाने का भी काम किया जा रहा है। और अनुमान है कि इससे भारत के फॉरेस्ट कवर में 7400 स्कैवेयर किलोमीटर से ज्यादा की बढोत्तरी होगी। बीते आठ वर्षों में भारत ने अपना जो फोरेस्ट कवर 20 हजार स्कवैयर किलोमीटर से ज्यादा बढ़ाया है, उसमें ये और मदद करेगा।

साथियों,

भारत आज Biodiversity और वाइल्डलाइफ से जुड़ी जिन नीतियों पर चल रहा है, उसने वन्य-जीवों की संख्या में भी रिकॉर्ड वृद्धि की है। आज चाहे Tiger हो, Lion हो, Leopard हो या फिर Elephant, सभी की संख्या देश में बढ़ रही है।

साथियों,

देश में ये भी पहली बार हुआ है, जब हमारे गांवों और शहरों को स्वच्छ बनाने, ईंधन में आत्मनिर्भरता, किसानों को अतिरिक्त आय और मिट्टी के स्वास्थ्य के अभियानों को हमने एक साथ जोड़ा है। गोबरधन योजना ऐसा ही एक प्रयास है। और जब मैं गोबरधन बोलता हूं, कुछ सेकुलर लोग सवाल उठाएंगे कि ये कौन सा गोवर्धन ले आया है। वो परेशान हो जाएंगे।

इस गोबरधन योजना के तहत बायोगैस प्लांट्स से गोबर और खेती से निकलने वाले अन्य कचरे को ऊर्जा में बदला जा रहा है। कभी आप लोग काशी-विश्‍वनाथ के दर्शन के लिए जाएं तो वहां एक गोबरधन का भी प्‍लांट कुछ किलोमीटर दूरी पर लगा है, जरूर देखकर आइएगा। इससे जो जैविक खाद बनती है, वो खेतों में काम आ रही है। मिट्टी पर अतिरिक्त दबाव बनाए बिना हम पर्याप्त उत्पादन कर सकें, इसके लिए बीते 7-8 सालों में 1600 से ज्यादा नई वैरायटी के बीज भी किसानों को उपलब्ध कराए गए हैं।

साथियों,

नैचुरल फार्मिंग में भी हमारी आज की चुनौतियों के लिए एक बहुत बड़ा समाधान है। इस साल के बजट में हमने तय किया है कि गंगा के किनारे बसे गांवों में नैचुरल फार्मिंग को प्रोत्साहित करेंगे, नैचुरल फार्मिंग का एक विशाल कॉरिडोर बनाएंगे। हमारे देश में इंडस्ट्रियल कॉरिडोर हमने सुना है, डिफेंस कॉरिडोर हमने सुना है, हमने एक नया कॉरिडोर प्रारंभ किया है गंगा के तट पर, एग्रीकल्‍चर कॉरिडोर का, नेचुरल फार्मिंग का। इससे हमारे खेत तो केमिकल फ्री होंगे ही, नमामि गंगे अभियान को भी नया बल मिलेगा। भारत, वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर बंजर जमीन को Restore करने के लक्ष्य पर भी काम कर रहा है।

साथियों,

पर्यावरण की रक्षा के लिए आज भारत नए innovations, pro-environment technology पर लगातार जोर दे रहा है। आप सभी ये जानते हैं कि प्रदूषण कम करने के लिए हम BS-5 norm पर नहीं आए बल्कि BS-4 से सीधे BS-6 पर हम जंप लगा दिए हैं। हमने जो देशभर में LED बल्ब देने के लिए उजाला योजना चलाई, उसकी वजह से सालाना लगभग 40 मिलियन टन कार्बन एमिशन कम हो रहा है। सिर्फ लट्टू के बदलने से घर में..अगर सब लोग जुड़ जाएं तो, सबका प्रयास कितना बड़ा परिणाम लाता है।

भारत Fossil fuels पर अपनी निर्भरता को भी कम से कम करने का प्रयास कर रहा है। हमारी ऊर्जा जरूरतें, renewable sources से पूरी हों, इसके लिए हम तेजी से बड़े लक्ष्यों पर काम कर रहे हैं। हमने अपनी Installed Power Generation Capacity का 40 परसेंट non-fossil-fuel based sources से हासिल करने का लक्ष्य तय किया था। ये लक्ष्य भारत ने तय समय से 9 साल पहले ही हासिल कर लिया है। आज हमारी Solar Energy Capacity करीब 18 गुना बढ़ चुकी है। हाइड्रोजन मिशन हो या फिर सर्कुलर पॉलिसी का विषय हो, ये पर्यावरण रक्षा की हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। हम पुरानी गाड़ियों का स्‍क्रैप पॉलिसी लाए हैं, वो स्‍क्रैप पॉलिसी पर अपने-आप में एक बहुत बड़ा काम होने वाला है।

साथियों,

अपने इन प्रयासों के बीच आज पर्यावरण दिवस के दिन भारत ने एक और उपलब्धि हासिल की है। और ये हमारा सौभाग्‍य है कि खुशखबरी देने के लिए आज मुझे बहुत उचित मंच मिल गया है। भारत की परंपरा रही है कि जो यात्रा करके आता है, उसको छूते हैं तो आधा पुण्‍य आपको मिल जाता है। ये खुशखबरी मैं आज जरूर सुनाऊंगा देश को और दुनिया के लोगों को भी आनंद आएगा…हां कुछ लोग आनंद ही ले सकते हैं। आज भारत ने पेट्रोल में 10 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है।

आपको ये जानकर भी गर्व की अनुभूति होगी, कि भारत इस लक्ष्य पर तय समय से 5 महीने पहले पहुंच गया है। ये उपलब्धि कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि साल 2014 में भारत में सिर्फ डेढ़ प्रतिशत इथेनॉल की पेट्रोल में ब्लेंडिंग होती थी।

इस लक्ष्य पर पहुंचने की वजह से भारत को तीन सीधे फायदे हुए हैं। एक तो इससे करीब 27 लाख टन कार्बन एमिशन कम हुआ है। दूसरा, भारत को 41 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है। और तीसरा महत्वपूर्ण फायदा ये कि देश के किसानों को इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ने की वजह से 8 वर्षों में 40 हजार करोड़ रुपए से भी ज्‍यादा आय हुई है। मैं देश के लोगों को, देश के किसानों को, देश की Oil कंपनियों को इस उपलब्धि के लिए बधाई देता हूं।

साथियों,

देश आज जिस पीएम-नेशनल गति शक्ति मास्टर प्लान पर काम कर रहा है, वो भी पर्यावरण रक्षा में अहम भूमिका निभाएगा। गति-शक्ति की वजह से देश में लॉजिस्टिक्स सिस्टम आधुनिक होगा, ट्रांसपोर्ट सिस्टम मजबूत होगा। इससे प्रदूषण कम करने में बहुत मदद मिलेगी। देश में मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी हो, सौ से ज्यादा नए वॉटरवे के लिए काम हो, ये सभी पर्यावरण की रक्षा और Climate Change की चुनौती से निपटने में भारत की मदद करेंगे।

साथियों,

भारत के इन प्रयासों, इन अभियानों का एक और पक्ष है, जिसकी चर्चा बहुत कम होती है, ये पक्ष है Green Jobs. भारत जिस प्रकार पर्यावरण हित में फैसले ले रहा है, उन्हें तेजी से लागू कर रहा है, वो बड़ी संख्या में Green Jobs के अवसर भी बना रहे हैं। ये भी एक अध्ययन का विषय है कि जिसके बारे में सोचा जाना चाहिए।

साथियों,

पर्यावरण की रक्षा के लिए, धरती की रक्षा के लिए, मिट्टी की रक्षा के लिए जनचेतना जितनी ज्यादा बढ़ेगी, उतना ही बेहतर परिणाम मिलेगा। मेरा देश और देश की सभी सरकारों से, सभी स्थानीय निकायों से, सभी स्वयंसेवी संस्थाओं से आग्रह है कि अपने प्रयासों में स्कूल-कॉलेजों को जोड़िए, NSS-NCC को जोड़िए।

आज़ादी के अमृत महोत्सव में जल संरक्षण से जुड़ा एक आग्रह और भी करना चाहता हूं। अगले साल 15 अगस्त तक देश के हर जिले में कम से कम एक जिले में, हर जिले में कम से कम 75 अमृत सरोवर के निर्माण का काम आज देश में चल रहा है। 50 हजार से ज्यादा अमृत सरोवर आने वाली पीढ़ियों के लिए Water Security सुनिश्चित करने में मदद करेंगे। ये अमृत सरोवर, अपने आस-पास मिट्टी में नमी को बढ़ाएंगे, वॉटर लेवल को नीचे जाने से रोकेंगे और इनसे बायोडायवर्सिटी भी Improve होगी। इस विराट संकल्प में आप सभी की भागीदारी कैसे बढ़ेगी, इस पर ज़रूर विचार हम सब एक नागरिक के नाते करें।

साथियों,

पर्यावरण की सुरक्षा और तेज़ विकास, सभी के प्रयासों से, संपूर्णता की अप्रोच से ही संभव है। इसमें हमारी लाइफस्टाइल की क्या भूमिका है, हमें कैसे उसे बदलना है, इसे लेकर मैं आज शाम को एक कार्यक्रम में बात करने वाला हूं, विस्‍तार से कहने वाला हूं, क्‍योंकि वो अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर मेरा कार्यक्रम है। Lifestyle for Environment, Mission Life, इस शताब्दी की तस्वीर, इस शताब्दी में धरती का भाग्य बदलने वाले एक मिशन का आरम्भ। ये P-3 यानि Pro-Planet-People movement होगा। आज शाम को Lifestyle for the Environment के Global– Call for Action का लॉन्च हो रहा है। मेरा आग्रह है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए सचेत हर व्यक्ति को, इससे जरूर जुड़ना चाहिए। वरना हम AC भी चलाएंगे और रजाई भी ओढेंगे और फिर पर्यावरण के सेमिनार में बढ़िया भाषण भी देंगे।

साथियों,

आप सभी मानवता की बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं। आपको सिद्धि मिले, सद्गुरूजी ने जो लंबी ये, यानी मेहनत वाली यात्रा है, बाइक पर। वैसे उनका बचपन से शौक रहा है, ये लेकिन फिर भी काम बड़ा कठिन होता है। क्‍योंकि मैं जब कभी यात्राओं को आर्गेनाइज करता रहता था और मैं कहता था मेरी पार्टी में कि एक यात्रा को चलाना मतलब पांच-दस साल उम्र कम कर देना, इतनी मेहनत पड़ती है। सद्गुरू जी ने यात्रा की, अपने-आप में बहुत बड़ा काम किया है। और मुझे पक्‍का विश्‍वास है कि दुनिया को मिट्टी के प्रति स्‍नेह तो पैदा हुआ ही होगा, लेकिन भारत की मिट्टी की ताकत का भी परिचय मिला होगा।

आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्‍यवाद ! 

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